क्या बदला कोरोना काल में-

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क्या-क्या बदला कोरोना काल में  ! वो सुबह के समय घंटी का बजना, वो बच्चो का चहकना , वो गेम वाले पीरियड का इंतज़ार , सब कुछ बदल गया ! नहीं बदले तो आप और हम, और ये अध्यापक ! कितना सुना, कितना जान लिया हमने अपने आप को, हम सब को ,क्या है हम ! समाज का वो एक कोना जिस पर जिम्मेदारी तो बहुत है पर, निरकुंश आधार के साथ, कितनो ने साथ छोड़ दिया और अभी कितने कतार में है !

बदलता परिवेश

 

क्या लगता है ? जिम्मेदारी कम हो गयी ? नहीं , क्या हम भागे ? नहीं , फिर भी क्यों एक गुमनाम पत्थर की तरह ठुकरा दिया ! कुछ रुके या कुछ को समय ने तोड़ दिया ! परिवार वो भी एक कड़ी है उससे कैसे मुँह फेर लेते ! सब कुछ देखा पर नहीं देखा तो अपनापन , कुछ बेकार , ठुकराया सा वो पत्थर जो अभी भी ठोकरे खा रहा है ! ये भी बदला कोरोना काल में ,नहीं बदले तो आप और हम, और ये अध्यापक !

जिम्मेदारी के पहाड़ अब अनुमान से ज्यादा हो जायेगा ! सब कुछ खाली मिलेगा , वो संस्कार ढूंढ़ने पड़ेगे ! वो सब कुछ ढूंढना पड़ेगा जो बच्चो में छोड़ दिया था ! जब शिक्षा के मंदिर खुलेंगे तो फिर से घंटी बजेगी , फिर से वो बच्चो का चहकना , वो गेम वाले पीरियड का इंतज़ार! नहीं बदले तो आप और हम, और ये अध्यापक! क्या बदला था कोरोना काल में !

क्या मिलेगा वो तो बहुत देर की बात होगी पर जो खो दिया वो अनमोल था ! कुछ ग़लतफ़हमी भी शायद दूर हो गयी होगी जिसके हम राष्ट्र का निर्माता बोलते है वो अपने परिवार के सामने मूक बाधिर था ! ये सब बदला कोरोना काल में

ये सब बदला कोरोना काल में

वो सभी अध्यापक जो इस कोरोना काल में हमे छोड़ कर चले गए उनको श्रधांजलि !

पुष्पेंद्र कुमार
आप में से एक

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